इमाम हुसनै अलैहिस्सलाम ने महान ईश्वर पर भरोसा करते हुए इस्लाम की रक्षा के उद्देश्य से पूरी दृढ़ता के साथ क़दम आगे बढ़ाया। आज शताब्दियां गुज़र जाने के बाद भी इमाम हुसैन का आन्दोलन, पूरी मानव जाति को प्रेरित करता आ रहा है। यह एसा आन्दोलन है जो मनुष्य की प्रवृत्ति में निहित है और भौगोलिक सीमाओं से परे है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बारे में उर्दू के जानमाने शायर जोश मलीहाबादी कहते हैंः
(जोश मलीहाबादी)
करबला के मैदान में एक वह समय आया जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम समय बिल्कुल अकेले हो चुके थे। उनके वफ़ादार साथी शहीद हो गए थे। वे बुरी तरह से घायल थे और उनके जिस्म से ख़ून बह रहा था। एसे में जब उन्होंने देखा कि दुश्मन के सैनिक निहत्थे बच्चों और औरतों पर हमला करने जा रहे हैं तो इमाम हुसैन ने यज़ीद के राक्षसी सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा था कि हे अबू सुफ़ियान के मानन वालों, अगर तुम धर्म को नहीं मानते और तुम्हें क़यामत का भी डर नहीं है तो कम से कम अपने जीवन में आज़ाद तो रहो। इमाम हुसैन का यह संदेश स्पष्ट रूप में यह बताता है कि हर समाज और समाज का हर सदस्य, नैतिक मूल्यों के प्रति पाबंद रह सकता है। यह वह सिद्धांत है जो हर प्रकार के अपराध, असुरक्षा की भावना और नाना प्रकार के संकटों को समाप्त कर सकता है। पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है कि मुझको ईश्वर की ओर से इसलिए भेजा गया है ताकि मानवीय मूल्यों को चरम शिखर पर पहुंचा दूं ।
करबला के मैदान में ही एक अन्य स्थान पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीद की राक्षसी सेना को संबोधित करते हुए कहा था कि अगर जन्नत की आशा नहीं है और नरक का डर भी नहीं है तब भी मानवीय मूल्यों को हासिल करने की कोशिश करते रहना चाहिए क्योंकि मानवीय मूल्यों के माध्यम से ही सफलता मिलती है। पैग़म्बरे इस्लाम का कहना है कि मुझको ईश्वर की ओर से मानवीय मूल्यों को पूरा करने के लिए ही भेजा गया है। हज़रत मुहम्मद एसा धर्म लेकर आए थे जो हर हिसाब से परिपूर्ण और मुकम्मल था। इस संबन्ध में मशहूर वक्ता अल्लामा फ़िरोज़ हैदर कहते हैं।
आशूर की घटना ने इस्लाम के संदेश को भी फैलाया। इस दुःखद घटना ने इसके बारे में सोचने के लिए पूरी मानवता को सचेत किया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आन्दोलन के बाक़ी रहने का रहस्य यह है कि इमाम हुसैन का संदेश किसी व्यक्ति, जाति या समाज से विशेष नहीं है बल्कि यह पूरी मानवता के लिए है जिसमें गोरे-काले, अमीर-ग़रीब, छोटे-बड़े, महिला-पुरूष आदि सब ही आते हैं। जो भी व्यक्ति या जो भी समाज अपनी पवित्र प्रवृत्ति का स्वामी होगा वह इमाम हुसैन के संदेश को मन की गहराई से पसंद करेगा।
इस भावना को इमाम हुसैन के चालीसवें से संबन्धित अरबईन रैली में स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है। इस महारैली में हर साल दुनिया के कोने-कोने से लाखों लोग करबला पहुंचकर पूरे जोश के साथ इसमें भाग लेते हैं। वहां पर रंगभेद, जातिभेद, भौगोलिक दूरियां आदि इस प्रकार की कोई चीज़ दिखाई नहीं देती बल्कि उस स्थान पर सब एकजुट दिखाई देते हैं जो दूसरों के लिए आश्चर्च और इस्लाम के शत्रुओं के लिए क्रोध की बात है।
एक और विषय जिसने करबला की घटना को अमर बना दिया वह उसकी दूरदर्शिता है। संसार में जो बहुत से आन्दोलन हुए हैं उनमे बहुत ही कम एसे आन्दोलन होंगे जिनमें करबला के आंदोलन जैसी दूरदर्शिता पाई जाती हो। इनमें से बहुत से आन्दोलन तो मात्र भावनाओं को भड़काने से अस्तित्व में आए थे। यही कारण है कि वे अधिक समय तक नहीं चल सके। करबला के आन्दोलन में इमाम हुसैन ने शुरू से ही लोगों को सही बात बताई और किसी को कभी भी धोखे में नहीं रखा। इमाम की इच्छा यह थी कि लोग उनका अंधा अनुसरण न करें बल्कि बात को समझने के बाद ही सही फैसला करें। इमाम अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि दूरदर्शी वह है जो पहले सुनता है फिर सुकून से सोचता है फिर विचार करता है उसके बाद अंत में कोई फैसला करता है। इस प्रकार का व्यक्ति सदैव ही ख़तरों से सुरक्षित रहता है और गुमराह नहीं होने पाता। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी शहादत से पहले सारी बातें दूसरों को बता दी थीं।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सारे ही साथियों के भीतर यह विशेषता थी। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को आरंभ से ही यह विश्वास था कि शत्रु ने उनकी हत्या करने का फैसला कर ही लिया है इसलिए उन्होंने आशूर की रात अपने साथियों को संबोधित करते हुए कहा था कि तुम सब लोग आज़ाद हो। तुम लोग रात के अंधेरे में जहां भी जाना चाहो जा सकते हो। तुम अपने साथियों के हाथ पकड़कर रात में यहां से जाकर अपनी जान को सुरक्षित कर सकते हो। यज़ीद के फौजी, मेरे ख़ून के प्यासे हैं। उनको दूसरों से कोई काम नहीं है। ईश्वर तुम सबको क्षमा करे। इस प्रकार से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने साथियों में से किसी को भी धोखे में नही रखा बल्कि उनको पूरी वास्तविकता से अवगत करवाया।
अगर जानकारी या सूझबूझ की बात कही जाए तो करबला वालों में एक कैरेक्टर हज़रत अब्बास का है जो हुसैनी सेना के कमांडर थे। नौ मुहर्रम की रात यज़ीद की सेना के "शिम्र" ने हज़रत अब्बास को अपनी सेना में मिलाने के लिए उनसे कहा था कि अगर तुम हुसैन का साथ छोड़कर हमारे साथ आ जाओ तो मैं तुम्हारी जान बचवा सकता हूं। शिम्र की बात सुनकर हज़रत अब्बास ने उससे कहा था कि खु़दा की लानत हो तुझ पर। क्या तू यह चाहता है कि मैं हुसैन जैसे महान इंसान और पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे को छोड़कर तेरी तरफ़ आ जाऊं। तू क्या सोचता है कि मैं तुझ जैसे नीच का अनुसरण करूंगा।